आदीवासी लोग मंदिर/चर्च/आदि जगहों पर क्यों जाते हैं ?

आदीवासी  लोग मंदिर/चर्च/आदि जगहों पर क्यों जाते हैं ?

            
जोहार साथियों!!
हमारे किसी facebook मित्र ने सभी आदिवासी
साथियों से एक सवाल किया था कि "आखिर आदीवासी
लोग मंदिर/चर्च/आदि जगहों पर क्यों जाते हैं "
तो इस सवाल ने मुझे बहुत परेशान किया था और मैने
पाया कि- और जो कुछ हमने पाया वो बातें आप सभी लोगों
से साझा करने के दिल किया जो इस तरह से है!!
प्रकृति से दूर हो कर किसी न किसी भी तरह से भोग
वस्तों को कैस्नो प्राप्त कर ले !!
ये सब कुछ एक आकर्षण है और एक झुठा अभिमान के
सेवायें और कुछ भी नहीं !!
जिस तरह से रात को जुगनुओं का झुण्ड ये समझ कर
बहूत इत्रता(घमंड) दिखता है कि हम लोगों के कारण से ही
जग(संसार) में रौशनी फैलती हैं !! 
    पर जब रात होने लगती हैं तो पुरे आकाश में सितारे
टिमटिमने लगती हैं और फिर सितारे ये गलतफहमियां पाल
लेते हैं कि पुरे विश्व में हमारे द्वारा ही रौशनी फैल रही है पर
__ कुछ देर बाद ही सितारों का झुठा स्वाभिमान टूटता सा
महसूस होता है जब
पुर्ण चंद्रमा अपनी चंदनी की रौशनी चारों ओर बीखेरने
लगती है!!
औरों के तरह ही चांद भी अपने झूठे अहम् वा अहंकार
में फसँ जाता हैं और जैसे ही सुबह होने वाली होती हैं तैसे
सूर्य के प्रकाश की लालिमा सभी छोटे बड़े रौशनी पैदा
करने वालों की सभी गलतफहमियां दूर कर देती है!!
इसीलिए हम सभी ईसाई और अन्य हिन्दू वा अन्य धर्मों को
मानने वाले आदिवासियों को भी अपनी गलतियों से सीखें
और जितनी जल्दी से जल्दी अपने सारे गलतफहमियां दूर
कर लेना चाहिए!!
__ ऐसा ना हो कि ज्यादा देर हो जाए और हम सब सदा
सदा के लिए गहन अन्धकार में ही खो कर खत्म हो जाएं
???
           By: Rattan Nag

           


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